राजा वेन की कथा।

श्रीमैत्रेयजी कहतेहैं- वीरवर विदुरजी! सभी लोकों की कुशल चाहने वाले भृगु आदि मुनियों ने देखा कि अंग के चले जाने से अब पृथ्वी की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओं के समान (उच्छृंखल) होते जा रहे हैं। तब उन्होंने माता सुनीथा की सम्मति से, मंत्रियों के सहमत न होने पर भी वेन को भूमंडल के राजपद  पर अभिषिक्त कर दिया। वेन बड़ा कठोर शासक था। अभिमान वश अपने को ही सबसे बड़ा मानकर महापुरुषों का अपमान करने लगा। ‘कोई भी द्विजातिवर्ण का पुरुष कभी किसी प्रकार का यज्ञ, दान और हवन न करे’ अपने राज्य में यह ढिंढोरा पिटवा कर उसने सारे धर्म- कर्म बंद करवा दिए।

ऋषियों ने आपस में कहा- हमने अराजकता के भय से ही अयोग्य होने पर भी वेन को राजा बनाया था; किंतु अब उससे भी प्रजा को भय हो गया है। इतना सब होने पर भी हमें इसे समझाना अवश्य चाहिए। सभी ऋषि राजा वेन के पास गए और अपने क्रोध को छुपा कर उसे प्रिय वचनों से समझाते हुए कहने लगे, राजन! हम आपसे जो बात कहते हैं, उस पर ध्यान दीजिए। जो राजा दुष्ट मंत्री और चोर आदि से अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए न्यायानुकूल राज्य करता है, वह इस लोक में और परलोक में दोनों जगह सुख पाता है। जब आपके राज्य में ब्राह्मण लोग यज्ञों का अनुष्ठान करेंगे, तब उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान के अंशस्वरूप देवता आपको मनचाहा फल देंगे। अतः वीरवर! आपको यज्ञादि धर्मानुष्ठान बंद करके देवताओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिये। वेन ने कहा- तुम लोग बड़े मूर्ख हो! सभी देवता विष्णु आदि राजा के शरीर में रहते हैं; इसलिए राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं। इसलिए ब्राह्मणों! अपने सभी कर्मोंद्वारा एक मेरा ही पूजन करो और मुझीको बलि समर्पण करो। भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजा का अधिकारी हो सकता है।मुनियों के बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करने पर भी उसने उनकी बात पर ध्यान न दिया। तव कुपित हो सभी मुनि कहने लगे ‘मार डालो! इस स्वभाव से ही दुष्ट पापी को मार डालो! यदि यह जीता रह गया तो कुछ ही दिनों में संसार को अवश्य भस्म कर डालेगा। श्री हरि की निंदा वेन को छोड़कर और कौन कर सकता है’?।।

इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोध को प्रकट कर उन्होंने उसे मारने का निश्चय कर लिया। वह तो भगवान की निंदा करने के कारण पहले ही मर चुका था, इसलिए केवल हुंकारों से ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया। इसके बाद जब मुनिगण अपने- अपने आश्रमों को चले गये, तब वेन की शोकाकुला माता सुनीथा मंत्रादि के बल से तथा अन्य युक्तियों से अपने पुत्र के शव की रक्षा करने लगी।

एक दिन मुनिगण सरस्वती किनारे पवित्र जल में स्नान कर अग्निहोत्र से निवृत हो हरिचर्चा कर रहे थे। उन दिनों लोकों में आतंक फैलाने वाले बहुत से उपद्रव होते देखकर वे आपस में कहने लगे ‘आजकल पृथ्वी का कोई रक्षक नहीं है; इसलिए चोर- डाकुओं के कारण उसका कुछ अमंगल तो नहीं होने वाला है?’। राजर्षि अंग का वंश भी नष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसमें अनेक आमोध- शक्ति और भगवत्परायण राजा हो चुके हैं’ ऐसा निश्चय कर उन्होंने मृत राजा की जांघ को बड़े जोर से मथा तो उसमें से एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ। वह कौऐ के समान काला था; उसके सभी अंग और खासकर भुजाएं बहुत छोटी थीं, जबडे बहुत बड़े, टांगे छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश तांबेके- से रंग के थे। उसने बड़ी दीनता और नम्रभाव से पूछा कि ‘मैं क्या करूं?’ तो ऋषियों ने कहा- ‘निषीद (बैठ जा)।’ इसी से वह ‘निषाद’ कहलाया। उसने जन्म लेते ही राजा वेन के भयंकर पापों को अपने ऊपर ले लिया, इसलिए उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा, लूटपाट आदि पापकर्मों में रत रहते हैं; अतः वे गांव और नगर में न टिक कर वन और पर्वतों में ही निवास करते हैं।

आगे महाराज पृथु की कथा –

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