राजा ध्रुव के वंश का वर्णन तथा राजा अंग का चरित्र।

पिछली कहानी से आगे –

श्रीमैत्रेय मुनि के मुख से ध्रुवजी के विष्णुपद पर आरूढ़ होने का वृत्तांत सुनकर, विदुरजी के हृदय में भगवान विष्णु की भक्ति का उदय हो आया और उन्होंने मैत्रेयजी से पूछा हे मुनि! ये प्रचेता कौन थे? किसके पुत्र थे? किसके वंश में प्रसिद्ध थे? और उन्होंने कहां यज्ञ किया? श्रीमैत्रेयजी ने कहा विदुरजी! महाराज ध्रुव के वन चले जाने पर उनके पुत्र उत्कल ने अपने पिता के सार्वभौम वैभव और राज्यसिंहासन को अस्वीकार कर दिया। वह जन्म से ही शांत चित्त आसक्तिशून्य और समदर्शी था, इसलिए कुल के बड़े- बूढ़े तथा मंत्रियों ने उसे मूर्ख और पागल समझ कर उसके छोटे भाई भ्रमिपुत्र वत्सर को राजा बनाया। वत्सर की प्रेयसी भार्या (स्वर्वीथि )के गर्भ से (पुष्पा), तिग्मकेतु, इष उर्ज, वसु और जय नाम के छः पुत्र हुए। पुष्पार्ण के प्रभा और दोषा नाम की दो स्त्रियां थीं; उनमें से प्रभा के प्रातः, मध्यन्दिन और सायं- ये तीन पुत्र हुए। दोषा के प्रदोष, निशीथ और व्युष्ट- ये तीन पुत्र हुए। व्युष्ट ने अपनी भार्या (पुष्कर्णी) से सर्वतेजा नामक पुत्र उत्पन्न किया। उसकी पत्नी आकूति से चक्षु: नामक पुत्र हुआ। चाक्षुष मन्वंतर में वही मनु हुआ। चक्षु: मनुकी स्त्री नड्वला से पुरु, कुत्स, त्रित, धुम्न, सत्यवान, ऋत, व्रत, अग्निष्टोम, अतिरात्र, प्रद्युम्न , शिबि और उल्मुक – ये बारह सत्वगुणी बालक उत्पन्न हुए। इनमें उल्मुक ने अपनी पत्नी पुष्करिणी से अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और गय- ये छः उत्तम पुत्र उत्पन्न किए। अंग की पत्नी सुनीथा ने क्रूरकर्मा वेन को जन्म दिया, जिसकी दुष्टता से उद्विग्न होकर राजर्षि अंग नगर छोड़ कर चले गए थे। राजर्षि अंग ने कुपित होकर वेन को शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा ना रहने के कारण लोक में लुटेरों के द्वारा प्रजा को बहुत कष्ट होने लगा। यह देखकर उन्होंने वेन की दाहिनी भुजा का मंथन किया, जिससे भगवान विष्णु के अंशावतार आदिसम्राट महाराजा पृथु प्रकट हुए। विदुर जी ने पूछा- ब्रह्मण! महाराज अंग तो बड़े शील संपन्न, साधुस्वभाव, ब्राह्मण- भक्त और महात्मा थे। उनकेे वेन- जैसा दुष्ट पुत्र कैसे हुआ, जिसके कारण दु:खी होकर उन्हें नगर छोड़ना पड़ा। राजदंडधारी वेन का भी ऐसा क्या अपराध था, जो धर्मज्ञ मुनीश्वरों ने उसके प्रति शापरूप ब्रह्मदंड का प्रयोग किया।श्रीमैत्रेयजी ने कहा- विदुरजी! एक बार(राजषि) अंग ने अश्वमेध- महायज्ञ का अनुष्ठान किया। उसमें वेदवादी ब्राह्मणों के आवाहन करने पर भी देवतालोग अपना भाग लेने नहीं आए। तब ऋत्विजों ने विस्मित होकर यजमान अंग से कहा- राजन! हम आहुतियों के रूप में आपका जो घृत आदि पदार्थ हवन कर रहे हैं, उसे देवता लोग स्वीकार नहीं करते। ऋत्विजोंकी बात सुनकर यजमान अंग बहुत उदास हुए। तब उन्होंने याजकों की अनुमति से मौन तोड़कर सदस्यों से पूछा- सदस्यों! देवतालोग आवाहन करने पर भी यज्ञ में नहीं आ रहे हैं और न सोमपात्र ही ग्रहण करते हैं; आप बताइए मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है? सदस्यों ने कहा- राजन! इस जन्म में तो आपसे तनिक भी अपराध नहीं हुआ; हां, पूर्व जन्म का एक अपराध अवश्य है, जिसके कारण आप ऐसे सर्वगुणसंपन्न होने पर भी पुत्रहीन हैं। जब संतान के लिए साक्षात यज्ञपुरुष श्री हरि का आह्वान किया जाएगा, तब देवतालोग स्वयं ही अपना- अपना यज्ञ- भाग ग्रहण करेंगे।

इस प्रकार राजा अंग को पुत्र प्राप्ति कराने का निश्चय कर ऋत्विजों ने पशु में यज्ञरूप से रहने वाले श्री विष्णु भगवान के पूजन के लिए पूर्व पुरोडाश नामक चरु समर्पण किया। अग्नि में आहुति डालते ही अग्निकुंड से सोने के हार और शुभ्र वस्त्रों से विभूषित एक पुरुष प्रकट हुए; वे एक स्वर्णपात्र में सिद्ध खीर लिऐ हुए थे। राजा अंगने याजकों की अनुमति से अपनी अंजलि में वह खीर ले ली और उसे स्वयं सूंघकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी पत्नी को दे दिया। पुत्रहीना रानी ने वह पुत्र प्रदायिनी खीर खाकर अपने पति के सहवास से गर्भ धारण किया। उससे यथासमय उसके एक पुत्र हुआ। वह बालक बाल्यावस्था से ही अधर्म के वंश में उत्पन्न हुए अपने नाना मृत्यु का अनुगामी था (सुनीथा मृत्यु की  ही पुत्री थी); इसलिए वह भी अधार्मिक ही हुआ।वह दुष्ट बालक धनुष- बाण चढ़ाकर वन में जाता और व्याधके समान बेचारे भोलेभाले हरिणों की हत्या करता। खेल ही खेल में अपनी बराबरी के बालकों को पशुओं की भांति बलात् मार डालता। वेन की ऐसी दुष्ट प्रकृति देखकर महाराज अंग ने उसे तरह-तरह से सुधारने की चेष्टा की; परंतु वे उस उसे सुमार्ग पर लाने में समर्थ न हुए। इससे उन्हें बड़ा ही दु:ख हुआ। उनका चित्त गृहस्थी से विरक्त हो गया। वे आधी रात के समय चुपचाप उस महान ऐश्वर्य से भरे राज महल से निकलकर वन को चले गए। महाराज विरक्त होकर घर से निकल गए हैं, यह जानकर सभी प्रजाजन, पुरोहित, मंत्री और (सुह्रदगण) आदि अत्यंत शोकाकुल होकर पृथ्वी पर उनकी खोज करने लगे। जब उन्हें अपने स्वामी का कहीं पता न लगा, तब वे निराश होकर नगर में लौट आए और वहां जो मुनिजन एकत्रित हुए थे, उन्हें यथावत प्रणाम करके उन्होंने आंखों में आंसू भरकर महाराज के न मिलने का वृतांत सुनाया। इसके बाद उन्होंने वेन को राजा बनाया।

आगे वेन की कथा –

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