वंदीजन द्वारा महाराज पृथु की स्तुति।

पिछली कहानी से आगे –

जब पृथु ने अपने स्तुति करने से मना किया और श्री हरि की स्तुति करने को कहा, तब सूत आदि गायकलोग बड़े प्रसन्न हुए।तब वे मुनियों की प्रेरणा से उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे। ‘आप साक्षात देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं। आप साक्षात श्रीहरि के कला अवतार हैं और आपकी कीर्ति बड़ी उदार है। महाराज पृथु वेन- रूप अरणि के मंथन से प्रकट हुए अग्नि के समान हैं। शत्रुओं के लिए यह अत्यंत दुर्धर्ष और दु:सह होंगे। ये दुष्टों को दण्ड पाणि यमराज के समान सदा दंड देने के लिए उद्धत रहेंगे। प्रजा के जीवननिर्वाह के लिए गौ- रूपधारिणी पृथ्वी का दोहन करेंगे। ये सरस्वती के उद्गमस्थान पर 100 अश्वमेधयज्ञ करेंगे। ये सारी दिशाओं को जीतकर अपने तेजसे प्रजा के क्लेशरूप कांटे को निकाल कर संपूर्ण भूमण्डल के शासक होंगे।

क्रमशः

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