महाराज पृथु के सौ अश्वमेध यज्ञ।

पिछली कहानी से आगे –

राजा पृथु ने सौ अश्वमेध- यज्ञों की दीक्षा ली, यह देख कर भगवान इंद्र ने सोचा कि इस प्रकार तो पृथु के कर्म मेरे कर्मों की अपेक्षा बढ़ जाएंगे। महाराज पृथु तो एकमात्र श्रीहरि को ही अपना प्रभु मानते थे उनकी कृपा से उस यज्ञानुष्ठान में उनका बड़ा उत्कर्ष हुआ। किंतु यह बात देवराज इंद्र को सहन न हुई और उन्होंने उसमें विघ्न डालने की चेष्टा की। जिस समय महाराज पृथु अंतिम यज्ञद्वारा भगवान यज्ञपति की आराधना कर रहे थे, इंद्र ने ईर्ष्यावश गुप्त रूप से उनके यज्ञ का घोड़ा हर लिया। वे घोड़े को लिए बड़ी शीघ्रता से आकाश मार्ग से जा रहे थे कि उन पर भगवान अत्रि की दृष्टि पड़ गयी उनके कहने से महाराज पृथु का महारथी पुत्र इंद्र को मारने के लिए उनके पीछे दौड़ा और बड़े क्रोध से बोला ‘अरे खड़ा रह! खड़ा रह’। इंद्र सिर पर जटाजूट और शरीर में भस्म धारण किए हुए थे। उनका ऐसा वेष देखकर पृथुकुमार ने उन्हें मूर्तिमान धर्म समझा, इसलिए उन पर बाण नहीं छोड़ा। तब महर्षि ने अत्री ने पुनः उसे इंद्र को मारने के लिए आज्ञा दी- ‘वत्स! इस देवताधम इंद्र ने तुम्हारे यज्ञ में विघ्न डाला है, तुम इसे मार डालो’। इंद्र उसे पीछे आते देख, उस वेष और घोड़े को छोड़कर वहीं अंतर्ध्यान हो गए और वह वीर अपना यज्ञपशु लेकर पिता की यज्ञशाला में लौट आया। उसके इस अद्भुत पराक्रम को देखकर महर्षियों ने उसका नाम विजिताश्व रखा।

इंद्र ने पुनः घोड़े को चुराने के लिए घोर अंधकार फैला दिया और उसी में छुपकर वे फिर उस घोड़े को उसकी जंजीर सहित ले गये। अत्रि मुनि ने फिर उन्हें आकाश में तेजी से जाते देखा, किंतु उनके पास कपाल और खट्वांग देखकर पृथुपुत्र ने उनके मार्ग में कोई बाधा न डाली। तब अत्रि ने राजकुमार को फिर उकसाया और उसने गुस्से में भरकर इंद्र को लक्ष्य बनाकर अपना बाण चढ़ाया। यह देखते ही देवराज उस वेष और घोड़े को छोड़कर वहीं अंतर्ध्यान हो गये। वीर विजिताश्व अपना घोड़ा लेकर पिता की यज्ञशाला में लौट आया।

इंद्र की इस कुचाल का पता लगने पर परम पराक्रमी महाराज पृथु को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपना धनुष उठा कर उस पर बाण चढ़ाया। जब ऋत्विजों ने देखा कि महाराज पृथु इंद्र का वध करने को तैयार हैं, तब उन्हें रोकते हुए कहा, ‘राजन्! आप तो बड़े बुद्धिमान हैं, यज्ञदीक्षा ले लेने पर शास्त्रविहित यज्ञपशु को छोड़कर और किसी का वध करना उचित नहीं है। हम अमोध आवाहन- मंत्रों द्वारा इंद्र को यहीं बुला लेते हैं और बलात अग्नि में हवन किए देते हैं’। उसके यजकों ने क्रोधपूर्वक इंद्र का आह्वान किया। वे स्रुवाद्वारा आहुति डालना ही चाहते थे कि ब्रह्मा जी ने वहां आकर उन्हें रोक दिया। वे बोले, याजको! तुम्हें इंद्र का वध नहीं करना चाहिए, यह यज्ञसंज्ञक इंद्र तो भगवान की ही मूर्ति है। फिर राजर्षि पृथु से कहा, ‘राजन! आप तो मोक्षधर्म के जानने वाले हैं; अतः अब आपको इन यज्ञानुष्ठानों की आवश्यकता नहीं है। भगवान ब्रह्मा जी के इस प्रकार समझाने पर प्रबल पराक्रमी महाराज पृथु ने यज्ञ का आग्रह छोड़ दिया और इंद्र के साथ प्रीतिपूर्वक संधि भी कर ली। तब उनके यज्ञों से तृप्त हुए देवताओं ने उन्हें अभीष्ट वर दिये।

क्रमशः

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