पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना और पृथ्वी द्वारा उनकी स्तुति करना और पृथ्वी का दोहन।

पिछली कहानी से आगे –

जब वंदीजनों ने महाराज पृथु के गुण और कर्मों का बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उन्हें मनचाही वस्तुएं देकर संतुष्ट किया। उन्होंने ब्राह्मणादि चारों वर्णों, सेवकों, मंत्रियों, पूरोहितों, पुरवासियों, देशवासियों, भिन्न-भिन्न व्यवसायियों तथा अन्यान्य आज्ञानुवतियों का भी सत्कार किया। विदुर जी ने श्रीमैत्रेयजी से पूछा ब्रह्मण! पृथ्वी तो अनेक रूप धारण कर सकती है, उसने गौ का रूप ही क्यों धारण किया? और जब महाराज पृथु ने उसे दुहा, तब बछड़ा कौन बना? और दुहने का पात्र क्या हुआ? पृथ्वीदेवी तो पहले स्वभाव से ही ऊंची- नीची थी। उसे उन्होंने समतल किस प्रकार किया?श्रीमैत्रेयजी ने कहा विदुरजी! ब्राह्मणों ने महाराज पृथु का राज्याभिषेक करके उन्हें प्रजा का रक्षक उद्घोषित किया। इन दिनों पृथ्वी अन्नहीन हो गई थी, इसलिए भूख के कारण प्रजाजनों के शरीर सूखकर कांटे हो गए थे। उन्होंने अपने स्वामी पृथु के पास आकर कहा आप समस्त लोकों की रक्षा करने वाले हैं, आप ही हमारी जीविका के भी स्वामी हैं, अतः राजराजेश्वर आप हम क्षूधापीड़ितों को शीघ्र ही अन्न देने का प्रबंध कीजिए। 

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं कुरुवर! प्रजा का करुण क्रंदन सुनकर महाराज पृथु बहुत देर तक विचार करते रहे। अंत में उन्हें अन्नाभाव का कारण मालूम हो गया। ‘पृथ्वी ने स्वयं ही अन्न एवं और औषधादि को अपने भीतर छुपा लिया है’ अपनी बुद्धि से इस बात का निश्चय करके उन्होंने क्रोध में अपना धनुष उठाया और त्रिपुरविनाशक भगवान शंकर के समान अत्यंत क्रोधित होकर पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर बाण चढाया। उन्हें शस्त्र उठाए देख पृथ्वी कांप उठी और डर कर गौ का रूप धारण करके भागने लगी। यह देखकर महाराज पृथु की आंखें क्रोध से लाल हो गयीं। वे जहां- जहां पृथ्वी गई, वहां -वहां धनुष पर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे। जहां – जहां भी वह दौड़ कर जाती, वहीं उसे महाराज पृथु हथियार उठाए अपने पीछे दिखाई देते। तब वह अत्यंत भयभीत होकर दु:खित चित्त से पीछे की ओर लौटी और पृथु जी से कहने लगी- मैं अत्यंत दीन और निरपराध हूं, आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं?तब महाराज पृथु ने कहा- पृथ्वी! तू मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाली है। तू यज्ञ में देवता रूप से भाग तो लेती है, किंतु उसके बदले में हमें अन्न नहीं देती; इसलिए आज मैं तुझे मार डालूंगा। जो दुष्ट अपना ही पोषण करने वाला तथा अन्य प्राणियों के प्रति निर्दय हो- वह पुरुष, स्त्री, अथवा नपुंसक कोई भी हो- उसका मारना राजाओं के लिए न मारने के ही समान है। तब पृथ्वी ने कहा आप साक्षात परमपुरुष और जगद्विधाता हैं। प्रभो! आप अपना क्रोध शांत कीजिए और मैं जो प्रार्थना करती हूं, उसे ध्यान देकर सुनिये।

राजन! पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने जिन धान्य आदि को उत्पन्न किया था मैंने देखा कि यम- नियमादि व्रतों का पालन न करने वाले दुराचारीलोग ही उन्हें खाये का रहे हैं। इसी से यज्ञ के लिए ओषधियों को मैंने अपने में छुपा लिया। अब अधिक समय हो जाने से अवश्य ही वे धान्य मेरे उधर में जीर्ण हो गए हैं; आप उन्हें पूर्वाचार्यों के बतलाए हुए उपाय से निकाल लीजिये। यदि आपको समस्त प्राणियों के अभीष्ट एवं बल की वृद्धि करने वाले अन्न की आवश्यकता है तो आप मेरे योग्य बछड़ा, दोहनपात्र, और दोहने वाले की व्यवस्था कीजिये; मैं उस बछड़े के स्नेह से पिन्हाकर दूध के रूप में आपको सभी अभीष्ट वस्तुएं दे दूंगी। राजा! आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा- ऋतु बीत जाने पर भी मेरे ऊपर इंद्र का बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे- मेरे भीतर की आद्रता सूखने ना पावे।

महाराज पृथु ने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बना अपने हाथों में ही समस्त धान्यों को दुह लिया। ऋषियों ने बृहस्पतिजी को बछड़ा बनाकर इंद्रिय( वाणी, मन और श्रोत्र) रूप पात्र में पृथ्वी देवी से वेदरूप पवित्र दूध दुहा। देवताओं ने इंद्र को बछड़े के रूप में कल्पना का स्वर्णपात्र में अमृत, वीर्य( मनोबल), ओज( इन्द्रियबल) और शारीरिक बलरुप दूध दुहा। दैत्य और दानवों ने असुरश्रेष्ठ प्रह्लादजी को वत्स बनाकर लोहे के पात्र में मदिरा और आसव( ताड़ी आदि) रूप दूध दुहा। गंधर्व और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर कमल रूप पात्र में संगीत माधुर्य और सौंदर्य रूप दूध दुहा। श्राद्ध के अधिष्ठाता महाभाग पित्रगण ने आर्यमा नाम के पित्रीश्वर को वत्स बनाया तथा मिट्टी के कच्चे पात्र में श्रद्धापूर्वक कव्य( पितरों को अर्पित किया जाने वाला अन्न) रूप दूध दुहा। फिर कपिल देव जी को बछड़ा बना कर आकाश रूप पात्र में सिद्धों ने अणिमादि अष्टसिद्धि तथा विद्याधरों ने आकाशगमन आदि विद्याओं को दुहा। किम्पुरुषादि अन्य मायावियों ने मयदानव को बछड़ा बनाया तथा अंतर्ध्यान होना, विचित्र रूप धारण कर लेना आदि संकल्पमयी मायाओं को दुग्धरूप से दुहा। इसी प्रकार यक्ष,   राक्षस तथा भूत- पिशाचादि मांसाहारीयों ने भूतनाथ रूद्रको बछड़ा बनाकर कपालरूप पात्र में रुधिरासवरुप दूध दुहा। विषैले जंतुओं ने तक्षक को बछड़ा बनाकर मुखरूप पात्र में विषरूप दूध दुहा। पशुओं ने रूद्र के वाहन बैल को वत्स बनाकर वनरूप पात्र में तृण रूप दूध दुहा। मांसभक्षी जीवों ने सिंहरूप बछड़े के द्वारा अपने शरीररूप  पात्र में कच्चा मांस रूप दूध दुहा। पक्षियों ने गरुडजी को वत्स बनाकर कीट- पतंगादि चर और फलादि अचर पदार्थों को दुग्धरूपसे दुहा। वृक्षों ने वट को वत्स बनाकर अनेक प्रकार का रसरूप दूध दुहा। पर्वतों ने हिमालयरूप बछड़े के द्वारा अपने शिखररूप पात्र में अनेक प्रकार की धातुओं को दुहा। विदुरजी! इस प्रकार पृथु आदि सभी अन्न- भोजियों ने भिन्न-भिन्न दोहन- पात्र और वत्सों के द्वारा अपने- अपने विभिन्न अन्नरूप दूध पृथ्वी से दुहे। इससे महाराज पृथु ऐसे प्रसन्न हुए कि पृथ्वी के प्रति उनका उसी के समान स्नेह हो गया और उन्होंने उसे अपनी कन्या के रूप में स्वीकार कर लिया। फिर राजाधिराज पृथु ने अपने धनुष की नोक से पर्वतों को फोड़कर सारे भूमंडल को समतल कर दिया। महाराज पृथु से पहले इस पृथ्वीतल पर पुर – ग्रामादि का विभाग नहीं था; सब लोग अपनी सुविधा के अनुसार जहां तहां बस जाते थे।

क्रमशः

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