महाराज पृथु का आविर्भाव और राज्याभिषेक।

ऋषियों के द्वारा अत्याचारी वेन को मारने के बाद अंग का वंश समाप्त न हो जाए, इसलिए उसकी जांघ से उत्पन्न पुत्र निषाद बहुत हिंसा करने वाला हुआ। इसके बाद ब्राह्मणों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, तब उनसे एक स्त्री- पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। ऋषियों ने यह देखकर कहा – यह पुरुष भगवान विष्णु की विश्वपालिनी कला से प्रकट हुआ है और यह स्त्री उन परम पुरुष की अनपायिनी(कभी अलग न होने वाली शक्ति) लक्ष्मी जी का अवतार है। इनमें से जो पुरुष है वह अपने सुयश का प्रथन- विस्तार करने के कारण परम यशस्वी ‘पृथु’ नामक सम्राट होगा। और यह सुंदरी इन पृथु को ही अपना पति बनाएगी। इसका नाम अर्चि होगा। इसी समय ब्रह्माजी देवता और अन्य देवेश्वरों के साथ पधारे। उन्होंने पृथु के दाहिने हाथ में भगवान विष्णु की हस्त रेखाएं और चरणों में कमल का चिन्ह देखकर उन्हें श्रीहरि का ही अंश समझा।

उचित समय आने पर ब्राह्मणों ने महाराज पृथु के अभिषेक का आयोजन किया। तथा पृथु का विधिवत राज्याभिषेक किया। उन्हें कुबेर ने बड़ा ही सुंदर सोने का सिंहासन दिया तथा वरुण ने चंद्रमा के समान श्वेत और प्रकाशमय छत्र दिया, वायु ने दो चंवर, धर्म ने कीर्तिमयी माला, इंद्र ने मनोहर मुकुट, यम ने दमन करने वाला दंड, ब्रह्मा ने वेदमय कवच, सरस्वती ने सुंदर हार, विष्णुभगवान ने सुदर्शनचक्र, विष्णु- प्रिया लक्ष्मी जी ने अविचल संपत्ति, रूद्र ने दस चंद्राकार चिन्हों से युक्त तलवार, अंबिका जी ने सौ चंद्राकार चिन्होंवाली ढाल, चंद्रमा ने अमृतमय अश्व, त्वष्टा (विश्वकर्मा) ने सुंदर रथ, अग्नि ने सुदृढ़ धनुष, सूर्य ने तेजोमय बाण, पृथ्वी ने चरणस्पर्श- मात्र से अभीष्ट स्थान पर पहुंचा देने वाली योगमयी पादुकाऐं, आकाश के द्यौ देवता ने नूतन पुष्पों की माला, सिद्ध-गंधर्व आदि ने नाचने- गाने, बजाने और अंतर्ध्यान हो जाने की शक्तियां, ऋषियों ने आमोध आशीर्वाद, समुद्र ने अपने से उत्पन्न हुआ शंख, तथा सातों समुद्र पर्वत और नदियों ने उनके रथ के लिए बेरोक- टोक मार्ग उपहार में दिए। इसके पश्चात सूत, मागधऔर बंदी- जन उनकी स्तुति करने के लिए उपस्थित हुए। उनके इस प्रकार उपस्थित होने पर पृथु ने कहा- देखो, शिष्ट पुरुष पवित्रकीर्ति श्रीहरि के गुणानुवाद के रहते हुए तुच्छ मनुष्यों की स्तुति नहीं किया करते। इसलिए आप लोग भगवान विष्णु की स्तुति करो।

क्रमशः

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