ध्रुव के भाई उत्तम का मारा जाना और ध्रुव का यक्षों के साथ युद्ध।

आगे का भाग–

ध्रुव ने प्रजापति शिशुमार की पुत्री भ्रमि के साथ विवाह किया, इससे उनके कल्प और वत्सर नाम के दो पुत्र हुए। महाबली ध्रुव की दूसरी स्त्री वायुपुत्री इला थी। उससे उनके उत्कल नाम के एक पुत्र और एक कन्यारत्न का जन्म हुआ। उत्तम का अभी विवाह नहीं हुआ था कि एक दिन शिकार खेलते समय उसे हिमालय पर्वत पर एक बलवान यक्ष ने मार डाला। उसके साथ उसकी माता भी परलोक सिधार गयी।ध्रुव ने जब भाई के मारे जाने का समाचार सुना तो वे क्रोध, शोक और उद्वेग से भरकर एक विजयप्रद रथ पर सवार हो यक्षों के देश में जा पहुंचे। उन्होंने उत्तर दिशा में जाकर हिमालय की घाटी में यक्षों से भरी हुई अलकापुरी देखी। वहां पहुंचकर महाबाहु ध्रुव ने अपना शंख बजाया तथा संपूर्ण आकाश और दिशाओं को गुंजा दिया। महाबलवान यक्षवीरों को यह शंखनाद सहन न हुआ इसलिए वे तरह-तरह के अस्त्र- शस्त्र लेकर नगर के बाहर निकल आए और ध्रुव पर टूट पड़े। महारथी ध्रुव प्रचंड धनुर्धर थे। यक्षों की संख्या एक लाख तीस हजार थी। उन्होंने ध्रुव जी पर बाणों की वर्षा की, इस भीषण शस्त्र- वर्षा से ध्रुव जी बिल्कुल ढक गए, लोगों को उनका दीखना बंद हो गया। यक्ष लोग अपनी विजय की घोषणा करते हुए युद्ध क्षेत्र में सिंह की तरह गरजने लगे। इसी बीच में ध्रुव जी का रथ एकाएक वैसे ही प्रकट हो गया, जैसे कुहरे में से सूर्य भगवान निकल आते हैं। ध्रुव जी ने अपने दिव्य धनुष की टंकार करके शत्रुओं के दिल दहला दिए और फिर प्रचंड बाणों की वर्षा करके अनेकों यक्षों का वध कर दिया, जो यक्ष किसी प्रकार जीवित बचे वह मैदान छोड़कर भाग गए। ध्रुव जी ने देखा कि उस विस्तृत रणभूमि में एक भी शत्रु अस्त्र-शस्त्र लिए उनके सामने नहीं हैं, तो उनकी इच्छा अलकापुरी देखने की हुई; किंतु वह पुरी के भीतर नहीं गए ‘ये मायावी क्या करना चाहते हैं इस बात का मनुष्य को पता नहीं लग सकता’ सारथी से इस प्रकार कहकर वे अपने रथ में बैठे रहे। तब उन्हें समुद्र की गर्जना के समान आंधी का भीषण शब्द सुनाई दिया तथा दिशाओं में उठती हुई धूल भी दिखाई दी। क्रूर स्वभाव असुरों ने अपनी आसुरी माया से बहुत से कौतुक दिखलाये, तथा ध्रुव जी पर अपनी दुस्तर माया फैलाई, यह सुनकर वहां कुछ मुनियों ने आकर उनके लिए मंगल कामना की। मुनियों ने कहा- उत्तानपादनंदन ध्रुव! भगवान नारायण तुम्हारे शत्रुओं का संहार करें। भगवान का तो नाम ही ऐसा है,जिसके सुनने और कीर्तन करने मात्र से मनुष्य दुस्तर मृत्यु के मुख से अनायास ही बच जाता है।

क्रमशः

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