मनु द्वारा ध्रुवजी को यक्षों के साथ युद्ध बंद करने के लिए समझाना।

आगे का भाग-

ऋषियों का यह कथन कि श्री नारायण का नाम ही ऐसा है जिसके सुनने और कीर्तन करने मात्र से ही शत्रुओं का संहार हो जाता है, सुनकर महाराज ध्रुव ने आचमन कर श्री नारायण के बनाए हुए नारायणास्त्र को अपने धनुष पर चढ़ाया, उस बाण के चढ़ते ही यक्षों द्वारा रची हुई नाना प्रकार की माया उसी क्षण नष्ट हो गई, तथा उस अस्त्र से बड़े तीखे बाण निकले। उन तीखी धार वाले बाणों ने शत्रुओं को बेचैन कर दिया। तब उस राणांगण में अनेकों यक्षों ने अत्यंत कुपित होकर अपने अस्त्र-शस्त्र संभाले और वे ध्रुव जी पर टूट पड़े। उन्हें आते देख ध्रुव जी ने अपने बाणों द्वारा अनेकों यक्षों को सत्यलोक भेज दिया। अब उनके पितामह स्वायंभूव मनु ने देखा कि ध्रुवजी अनेक निरपराध यक्षों को मार रहे हैं, तो वे बहुत से ऋषियों को लेकर वहां आए और अपने पौत्र ध्रुव को समझाने लगे।उन्होंने कहा बेटा! बस, बस! अधिक क्रोध करना ठीक नहीं। यह पापी नरक का द्वार है। इसी के वशीभूत होकर तुमने इन निरपराध यक्षों का वध किया है। तुम्हें तो प्रभु भी अपना प्रिय भक्त समझते हैं तथा भक्तजन भी तुम्हारा आदर करते हैं। फिर भी तुमने ऐसा निंदनीय कर्म कैसे किया? बेटा! ये कुबेर के अनुचर  तुम्हारे भाई को मारने वाले नहीं हैं, क्योंकि मनुष्य के जन्म- मरण का वास्तविक कारण तो ईश्वर है। वे अभक्तों के लिए मृत्यरूप और भक्तों के लिए अमृतरूप हैं। क्रोध कल्याण मार्ग का बड़ा ही विरोधी है। भगवान तुम्हारा मंगल करें। क्रोध के वशीभूत हुए पुरुष से सभी लोगों को बड़ा भय होता है; इसलिए जो बुद्धिमान पुरुष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणी को भय न हो और मुझे भी किसी से भय न हो, उसे क्रोध के वश में कभी नहीं होना चाहिये। तुमने जो यह समझकर कि ये मेरे भाई के मारने वाले हैं, इतने यक्षों का संहार किया है, इससे तुम्हारे द्वारा भगवान शंकर के सखा कुबेर जी का बड़ा अपराध हुआ है। इसलिए बेटा! जब तक कि महापुरुषों का तेज हमारे कुल को आक्रांत नहीं कर लेता; इसके पहले ही विनम्र भाषण और विनयके द्वारा शीघ्र उन्हें प्रसन्न कर लो।

इस प्रकार मनु जी ने अपने पौत्र को शिक्षा दी। तब ध्रुवजी ने उन्हें प्रणाम किया। इसके पश्चात मनु जी महर्षियों के सहित अपने लोक को चले गए।

क्रमशः

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