ध्रुव जी को कुबेर का वरदान और विष्णु लोक की प्राप्ति।

पिछली कहानी से आगे –

अपने भाई उत्तम का यक्षों द्वारा मारे जाने के बाद, ध्रुव ने यक्षों से युद्ध किया। यक्षों का बहुत ज्यादा विनाश देखने के बाद मनु ने अपने पौत्र ध्रुव को समझाया, इससे ध्रुव का क्रोध शांत हो गया और वह यक्षों के वध से निवृत हो गए; यह जानकर भगवान कुबेर वहां आए। उस समय यक्ष, चारण और किन्नर उनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखते ही ध्रुवजी हाथ जोड़कर खड़े हो गए तब कुबेर ने कहा, हे क्षत्रिय कुमार! तुमने अपने दादा के उपदेश से ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग दिया, इससे मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं। वास्तव में न तुमने यक्षों को मारा है और न यक्षों ने तुम्हारे भाई को। समस्त जीवों की उत्पत्ति और विनाश का कारण तो एकमात्र काल ही है। ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान तुम्हारा मंगल करें। तुम संसार पाश से मुक्त होने के लिए सब जीवो में समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान श्री हरि का भजन करो। ध्रुव! तुम्हें जिस वर की इच्छा हो, मुझसे निःसंकोच एवं निःशंक होकर मांग लो।

ध्रुव जी ने उनसे यही मांगा कि मुझे श्रीहरि की अखंड स्मृति बनी रहे, जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसार सागर को पार कर जाता है। ध्रुव जी बड़े ही शील संपन्न, ब्राह्मण भक्त, दीनवत्सल और धर्म मर्यादा के रक्षक थे, उनकी प्रजा उन्हें साक्षात पिता के समान मानती थी। इस प्रकार उन्होंने छत्तीस हजार वर्ष तक पृथ्वी पर शासन किया। इसके बाद अपने पुत्र उत्कल को राजसिंहासन सौंप दिया। इसके बाद वे बद्रिकाश्रम को चले गए।

ध्रुव जी का मन भगवान के चरण कमलों में तल्लीन हो गया तब श्रीहरि के प्रिय पार्षद सुनंद और नंद ने उनके पास जाकर मुस्कुराते हुए कहा कि वे उन्हें विष्णु धाम ले जाने के लिए आए हैं। विमान पर बैठकर ध्रुवजी ज्यों – ही भगवान के धाम को जाने के लिए तैयार हुए, त्यों – ही उन्हें अपनी माता सुनीति का स्मरण हो आया। वे सोचने लगे, ‘क्या मैं बेचारी माता को छोड़कर अकेला ही दुर्लभ वैकुंठधाम को जाऊंगा?’। नंद और सुनंद ने ध्रुव के हृदय की बात जानकर उन्हें दिखलाया की देवी सुनीति आगे-आगे दूसरे विमान पर जा रही हैं। उन्होंने क्रमशः सूर्य आदि सभी ग्रह देखे उस दिव्य विमान पर बैठकर ध्रुव जी ने त्रिलोकी को पार कर सप्त ऋषि मंडल से भी ऊपर भगवान विष्णु के नित्यधाम में पहुंचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की।

इस प्रकार उत्तानपाद के पुत्र भगवतपरायण श्रीध्रुवजी ने भगवान को प्रसन्न करके उनका परम पद प्राप्त कर तीनों लोकों के ऊपर विराजमान हुए।

क्रमशः

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *